UP Jal Nigam JE Termination Quashed: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश जल निगम की वर्ष 2013 में हुई जूनियर इंजीनियर भर्ती से जुड़े मामले में 73 सामान्य वर्ग के जूनियर इंजीनियरों की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति इरशाद अली की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि भर्ती प्रक्रिया में हुई प्रशासनिक या प्रक्रियात्मक गलती का खामियाजा उन कर्मचारियों को नहीं भुगताया जा सकता, जिनकी नियुक्ति सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत पदों पर नियमित चयन प्रक्रिया के बाद की गई थी।
कोर्ट के इस फैसले से लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ रहे प्रभावित जूनियर इंजीनियरों को बड़ी राहत मिली है।
क्या है पूरा मामला?
उत्तर प्रदेश जल निगम ने वर्ष 2013 में जूनियर इंजीनियर के 470 पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अभ्यर्थियों की नियुक्तियां की गईं। बाद में आरक्षित वर्ग के कुछ अभ्यर्थियों के चयन और आरक्षण व्यवस्था को लेकर विवाद सामने आया। इसके बाद भर्ती प्रक्रिया की समीक्षा और सुधार की कवायद शुरू हुई।
7 जनवरी 2014 को जल निगम के तत्कालीन प्रबंध निदेशक ने भर्ती में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति ने 15 जनवरी 2014 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
जांच समिति ने क्या सिफारिश की?
जांच समिति की सिफारिशों में अतिरिक्त आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को उपलब्ध रिक्त पदों पर समायोजित करने की बात कही गई थी। साथ ही पहले से चयनित सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों की सेवाएं समाप्त न करने की सिफारिश भी की गई थी।
मामले में बाद में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के समायोजन को लेकर अलग प्रक्रिया अपनाई गई। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी 28 जनवरी 2014 को आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों से संबंधित कार्रवाई के निर्देश दिए।
इसके बाद अतिरिक्त अभ्यर्थियों की नियुक्तियां की गईं। रिपोर्टों के अनुसार, 136 अतिरिक्त OBC/SC अभ्यर्थियों की नियुक्ति के बाद कुल नियुक्तियों की संख्या 543 तक पहुंच गई, जबकि मूल भर्ती 470 पदों के लिए थी।
73 सामान्य वर्ग के जूनियर इंजीनियरों की सेवाएं समाप्त
अतिरिक्त नियुक्तियों के बाद 2 दिसंबर 2014 को राकेश प्रताप सिंह समेत 73 सामान्य वर्ग के जूनियर इंजीनियरों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इसके खिलाफ प्रभावित कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का रुख किया।
मामला पहले भी हाईकोर्ट के सामने आया था। 18 दिसंबर 2014 के आदेश में अदालत ने बर्खास्तगी से जुड़े आदेश को निरस्त करते हुए जल निगम को मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था। इसके बाद विवाद दोबारा अदालत के सामने पहुंचा।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति इरशाद अली की पीठ ने राकेश प्रताप सिंह और अन्य याचिकाकर्ताओं से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने माना कि नियमित चयन प्रक्रिया के बाद सक्षम प्राधिकारी द्वारा नियुक्त किए गए कर्मचारियों को केवल भर्ती प्रक्रिया में सामने आई कथित अनियमितता के आधार पर सेवा से हटाना उचित नहीं है, खासकर तब जब संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने या व्यक्तिगत स्तर पर किसी हेरफेर का आरोप नहीं हो।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक स्तर पर हुई गलती को सुधारने के लिए उन कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त नहीं की जा सकतीं, जिन्होंने निर्धारित चयन प्रक्रिया के तहत नियुक्ति प्राप्त की थी।
कर्मचारियों को क्या राहत मिली?
हाईकोर्ट के फैसले से 73 सामान्य वर्ग के जूनियर इंजीनियरों की बर्खास्तगी का आदेश निरस्त हो गया है। इससे प्रभावित कर्मचारियों को अपनी सेवा जारी रखने का रास्ता साफ हुआ है।
यह फैसला सरकारी भर्ती प्रक्रिया में प्रशासनिक जवाबदेही और कर्मचारियों के सेवा अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक संदेश यह है कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति नियमित प्रक्रिया के तहत हुई है और उसके खिलाफ व्यक्तिगत तौर पर कोई धोखाधड़ी या गलत आचरण साबित नहीं हुआ है, तो केवल प्रशासनिक गलती को सुधारने के लिए उसकी नौकरी समाप्त करना उचित नहीं माना जा सकता।
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