नवाब आसफ-उद-दौला ने रोजगार देने के लिए शुरू करवाया था निर्माण, दिन में बनता और रात में ढहाया जाता था हिस्सा
Bara Imambara: लखनऊ की पहचान सिर्फ नवाबी तहजीब, अदब और खान-पान से नहीं है, बल्कि यहां की ऐतिहासिक इमारतों में उस दौर की सामाजिक सोच की कहानी भी छिपी है। इन्हीं में से एक है बड़ा इमामबाड़ा, जिसे आज भी लखनऊ की ऐतिहासिक विरासत के रूप में देखा जाता है। इसके निर्माण के पीछे सिर्फ धार्मिक या स्थापत्य उद्देश्य नहीं था, बल्कि एक बड़े मानवीय प्रयास की कहानी भी जुड़ी हुई है।
जब अवध में पड़ा भीषण अकाल
18वीं सदी के अंतिम वर्षों में अवध क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा। लंबे समय तक बारिश न होने और फसलें खराब होने से बड़ी संख्या में लोग आर्थिक संकट में आ गए। गरीब परिवारों के सामने भोजन और रोजगार का संकट खड़ा हो गया था। ऐसे समय में अवध के नवाब आसफ-उद-दौला ने लोगों को राहत देने के लिए बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू करवाया।
रोजगार देने के लिए शुरू हुआ निर्माण
कहा जाता है कि नवाब ने इमामबाड़े के निर्माण में आम लोगों को काम दिया, ताकि उन्हें मजदूरी मिल सके और उनके घरों का चूल्हा जलता रहे। उस समय एक मशहूर कहावत भी प्रचलित हुई जिसको न दे मौला, उसको दे आसफ-उद-दौला यह कहावत नवाब की दानशीलता और जनता की मदद करने की उनकी छवि को दर्शाती है।
दिन में निर्माण, रात में कामगारों के लिए काम
बड़ा इमामबाड़ा बनाने से जुड़ी सबसे दिलचस्प लोककथा यह है कि दिन में मजदूर और आम लोग निर्माण कार्य करते थे, जबकि रात में अमीर और संभ्रांत वर्ग के लोगों को काम दिया जाता था। कहा जाता है कि रात में दिनभर बनाया गया कुछ हिस्सा गिरा दिया जाता था, ताकि अगले दिन मजदूरों को फिर काम मिल सके।
हालांकि, दिन में निर्माण और रात में उसे गिराने वाली बात को इतिहासकार अक्सर लोककथा के रूप में देखते हैं; इसे पूरी तरह प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जाता। लेकिन इससे उस दौर में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए किए गए राहत कार्यों की व्यापक धारणा जरूर सामने आती है।
स्थापत्य का अद्भुत नमूना
बड़ा इमामबाड़ा अपनी विशाल केंद्रीय मेहराबदार सभा-कक्ष के लिए प्रसिद्ध है। इसकी खासियत यह है कि मुख्य कक्ष में बड़े पैमाने पर निर्माण के बावजूद पारंपरिक अर्थों में लोहे की बीम या लकड़ी के सहारे का इस्तेमाल नहीं किया गया। इमारत की वास्तुकला आज भी देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती है।
इतिहास से बड़ा है इंसानियत का संदेश
बड़ा इमामबाड़ा आज एक ऐतिहासिक और पर्यटन स्थल है, लेकिन इसके निर्माण से जुड़ी कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि संकट के समय शासन और समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी आम लोगों को सहारा देना है। अकाल के दौर में शुरू हुआ यह निर्माण कार्य लखनऊ की स्थापत्य विरासत के साथ-साथ रोजगार और राहत के जरिए लोगों को संभालने की एक ऐतिहासिक मिसाल के रूप में भी याद किया जाता है।
आज जब लोग बड़ा इमामबाड़ा देखने पहुंचते हैं, तो उसकी विशालता और खूबसूरती के साथ उस दौर की वह कहानी भी याद आती है, जब एक इमारत का निर्माण हजारों जरूरतमंद लोगों के लिए रोजी-रोटी का जरिया बना था।
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