1964 में हुई कैंची धाम की स्थापना, हनुमान भक्ति, सेवा और प्रेम के संदेश ने बनाया देश-दुनिया में पहचान
नैनीताल: उत्तराखंड की पहाड़ियों के बीच बसा कैंची धाम आज सिर्फ एक आश्रम या मंदिर नहीं, बल्कि देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए आस्था और आध्यात्मिकता का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। इस धाम की पहचान 20वीं सदी के प्रसिद्ध संत नीम करोली बाबा, जिन्हें उनके भक्त प्यार से महाराजजी कहते हैं, से जुड़ी है। बाबा को हनुमान जी का अनन्य भक्त माना जाता है और उनके जीवन का प्रमुख संदेश प्रेम, सेवा और भक्ति रहा।
1964 में हुई कैंची धाम की शुरुआत
कैंची धाम की स्थापना का प्रमुख वर्ष 1964 माना जाता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, 15 जून 1964 को यहां हनुमान जी की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हुई और इसी दिन को कैंची धाम के स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है। इससे पहले बाबा नीम करोली इस स्थान से परिचित हो चुके थे और यहां आश्रम स्थापित करने की दिशा में काम शुरू हो चुका था।
यह स्थान नैनीताल जिले में भवाली-अल्मोड़ा मार्ग पर स्थित है। उत्तराखंड सरकार के पर्यटन संबंधी विवरण के अनुसार, कैंची नाम इस क्षेत्र की सड़क के दो तीखे हेयरपिन मोड़ों से जुड़ा है, जिन्हें स्थानीय बोली में ‘कैंची’ कहा जाता है।
कौन थे नीम करोली बाबा?
नीम करोली बाबा 20वीं सदी के उन संतों में गिने जाते हैं जिनका प्रभाव भारत से बाहर तक पहुंचा। उनका वास्तविक नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा बताया जाता है। उनका जीवन साधना, यात्राओं और सेवा से जुड़ा रहा। बाद के वर्षों में कैंची धाम उनके प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में शामिल हो गया।
बाबा का व्यक्तित्व पारंपरिक संतों की सामान्य छवि से अलग बताया जाता है। वे लंबे-लंबे प्रवचन देने के बजाय अपने छोटे-छोटे संदेशों और व्यवहार के जरिए लोगों को प्रभावित करते थे। उनके भक्तों के बीच प्रेम, सेवा और ईश्वर-भक्ति उनके दर्शन के प्रमुख आधार माने जाते हैं।
हनुमान भक्ति से गहरा रिश्ता
कैंची धाम की सबसे बड़ी पहचान यहां स्थित हनुमान मंदिर से जुड़ी है। बाबा नीम करोली को हनुमान जी का अत्यंत समर्पित भक्त माना जाता है। इसी वजह से कैंची धाम धीरे-धीरे हनुमान भक्ति के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ।
भक्तों के लिए यह स्थान केवल दर्शन करने की जगह नहीं है। यहां आने वाले लोग कुछ समय शांत वातावरण में बैठकर ध्यान, प्रार्थना और आत्मचिंतन भी करते हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर भी कैंची धाम को नीम करोली बाबा से जुड़ा आध्यात्मिक स्थल बताया गया है, जहां अलग-अलग जगहों से लोग शांति और आध्यात्मिक अनुभव के लिए पहुंचते हैं।
आस्था कैसे बनी इतनी मजबूत?
कैंची धाम की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण बाबा नीम करोली के प्रति उनके भक्तों की गहरी आस्था है। बाबा के अनुयायी उनके जीवन से जुड़ी अनेक घटनाओं और अनुभवों को आध्यात्मिक महत्व देते हैं। हालांकि इन घटनाओं को आस्था और परंपरा के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, लेकिन इन कथाओं ने बाबा की लोकप्रियता को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई।
हर साल 15 जून को कैंची धाम का स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर पूजा, भजन-कीर्तन और भंडारे का आयोजन होता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
विदेशों तक पहुंचा बाबा का संदेश
नीम करोली बाबा की पहचान केवल भारत तक सीमित नहीं रही। अमेरिकी आध्यात्मिक शिक्षक राम दास, जिनका पहले नाम रिचर्ड अल्पर्ट था, बाबा से मिलने के बाद उनके विचारों से गहराई से प्रभावित हुए। बाद में राम दास ने अपनी पुस्तक और शिक्षाओं के जरिए बाबा के संदेश को पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाया।
यही वह दौर था जब कैंची धाम और नीम करोली बाबा का नाम पश्चिमी देशों में भी धीरे-धीरे पहचाना जाने लगा। बाद में स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग जैसे चर्चित नामों के कैंची धाम से जुड़े होने की खबरों ने इस स्थान को वैश्विक चर्चा में ला दिया। स्टीव जॉब्स 1974 में भारत आध्यात्मिक तलाश में आए थे और बाबा से मिलने की इच्छा रखते थे, लेकिन तब तक बाबा का निधन हो चुका था।
1973 में बाबा ने ली महासमाधि
नीम करोली बाबा का निधन 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में हुआ। उनके निधन के बाद भी उनके अनुयायियों की संख्या कम नहीं हुई। इसके उलट कैंची धाम उनकी आध्यात्मिक विरासत का प्रमुख केंद्र बनता गया।
बाबा की शिक्षा का मूल भाव किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं था। उनके संदेश में प्रेम, सेवा और भक्ति को महत्व दिया गया। यही सरलता आज भी उनके अनुयायियों को आकर्षित करती है।
आज क्यों बढ़ रहा है कैंची धाम का महत्व?
आज कैंची धाम देश के प्रमुख आध्यात्मिक पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। पहाड़ों के शांत वातावरण में स्थित यह आश्रम उन लोगों को भी आकर्षित करता है जो धार्मिक आस्था के साथ मानसिक शांति और आत्मचिंतन की तलाश में यहां आते हैं।
कैंची धाम की सबसे बड़ी ताकत उसका भव्य निर्माण नहीं, बल्कि उससे जुड़ी आस्था है। 1964 में शुरू हुआ यह छोटा-सा आश्रम आज ऐसी आध्यात्मिक पहचान बन चुका है, जिसकी चर्चा भारत से लेकर विदेशों तक होती है।
आस्था, सेवा और सादगी की विरासत
नीम करोली बाबा का जीवन और कैंची धाम की कहानी इस बात का उदाहरण है कि किसी धार्मिक स्थल की पहचान केवल उसके भवनों से नहीं बनती। लोगों की आस्था, संत की शिक्षाएं और वर्षों से चली आ रही परंपराएं किसी स्थान को तीर्थ का रूप देती हैं। कैंची धाम आज भी बाबा नीम करोली की इसी प्रेम, सेवा और भक्ति की विरासत को आगे बढ़ाता दिखाई देता है।
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