Noida Workers Protest: नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए श्रमिक आंदोलन से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय इतिहास स्नातक आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत रद्द कर दी है। अदालत ने कहा कि उनकी हिरासत के आधार में गंभीर प्रक्रियागत खामियां थीं और राज्य सरकार की ओर से पेश की गई कहानी ‘गढ़ी हुई’ थी। यह फैसला नोएडा वर्कर्स प्रोटेस्ट मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
अप्रैल 2026 में नोएडा और ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में श्रमिकों ने वेतन वृद्धि और बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था। 13 अप्रैल को कई स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक हो गया था। पुलिस ने इसके बाद हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित करने सहित विभिन्न आरोपों में कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई की। इसी मामले में आकृति चौधरी को भी गिरफ्तार किया गया था।
पुलिस का आरोप था कि आकृति चौधरी ने श्रमिक आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और हिंसा से उनका संबंध था। दूसरी ओर, उनके पक्ष ने अदालत में कहा कि वह श्रमिकों के समर्थन में प्रदर्शन में शामिल हुई थीं और आंदोलन की आयोजक नहीं थीं। उनकी ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में हिरासत के आधार को अस्पष्ट और अपर्याप्त बताया गया था।
पांच महीने तक हिरासत में रहीं आकृति
आकृति चौधरी करीब पांच महीने से हिरासत में थीं। उत्तर प्रदेश पुलिस ने मई 2026 में उनके खिलाफ National Security Act यानी NSA के तहत कार्रवाई की थी। वह उन लोगों में शामिल थीं जिन पर पुलिस ने नोएडा श्रमिक आंदोलन की हिंसा से जुड़े गंभीर आरोप लगाए थे।
NSA एक सख्त कानून है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को कुछ परिस्थितियों में सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संभावित खतरे को रोकने के लिए एहतियाती हिरासत में रखा जा सकता है। इसी वजह से आकृति की हिरासत का मामला कानूनी और नागरिक अधिकारों के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण बन गया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने आकृति चौधरी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए NSA के तहत उनकी हिरासत को रद्द कर दिया। अदालत ने गिरफ्तारी और उसके बाद BNSS के तहत जारी नोटिस की पूरी प्रक्रिया की जांच की। अदालत को इस क्रम में कई प्रक्रियागत खामियां मिलीं।
रिपोर्टों के अनुसार, राज्य सरकार ने अदालत को बताया था कि आकृति को 12 अप्रैल 2026 को सुबह 10:56 बजे गिरफ्तार किया गया था और उन्हें कानून के अनुसार नोटिस दिया गया था। हालांकि, अदालत ने रिकॉर्ड और जनरल डायरी की प्रविष्टियों को देखते हुए इस दावे पर सवाल उठाया और पाया कि नोटिस तथा गिरफ्तारी के क्रम में विसंगतियां थीं।
अदालत ने इन परिस्थितियों के आधार पर हिरासत को वैध नहीं माना और राज्य की ओर से प्रस्तुत आधार को ‘concocted story’ यानी ‘गढ़ी हुई कहानी’ करार दिया।
₹5 लाख मुआवजे का आदेश
हाईकोर्ट ने केवल NSA हिरासत रद्द नहीं की, बल्कि आकृति चौधरी को ₹5 लाख मुआवजा देने का भी निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि NSA हिरासत रद्द होने का मतलब सभी आपराधिक मामलों से स्वतः रिहाई नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, आकृति के खिलाफ श्रमिक आंदोलन से जुड़े अन्य मामले भी दर्ज हैं और उनमें जमानत की स्थिति अलग हो सकती है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
आकृति चौधरी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला Preventive Detention यानी एहतियाती हिरासत के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। अदालत की टिप्पणी यह रेखांकित करती है कि कठोर कानूनों का इस्तेमाल करते समय सरकार और पुलिस को कानूनी प्रक्रिया तथा उपलब्ध साक्ष्यों का सख्ती से पालन करना आवश्यक है।
Noida Workers Protest से जुड़ा यह मामला अब केवल श्रमिक आंदोलन और वेतन वृद्धि की मांग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, पुलिस कार्रवाई, NSA के इस्तेमाल और न्यायिक निगरानी जैसे व्यापक मुद्दों से भी जुड़ गया है। आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द किए जाने का फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों में Preventive Detention की न्यायिक समीक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।
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